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रोगों में कà¥à¤› रोग तो à¤à¤¸à¥‡ हैं जो पीड़ित वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· अथवा अपà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· संपरà¥à¤•, या उनके रोगोतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤•, विशिषà¥à¤Ÿ ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ से दूषित पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के सेवन à¤à¤µà¤‚ निकट संपरà¥à¤•, से à¤à¤• से दूसरे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ हो जाते हैं। इसी पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ को संकà¥à¤°à¤®à¤£ (Infection) कहते हैं। सामानà¥à¤¯ बोलचाल की à¤à¤¾à¤·à¤¾ में à¤à¤¸à¥‡ रोगों को छà¥à¤¤à¤¹à¤¾ रोग या छूआछूत के रोग कहते हैं। रोगगà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤ या रोगवाहक पशॠया मनà¥à¤·à¥à¤¯ संकà¥à¤°à¤®à¤£ के कारक होते हैं। संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोग तथा इन रोग के संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ होने की कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ समाज की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से विशेष महतà¥à¤µ की है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि विशिषà¥à¤Ÿ उपचार à¤à¤µà¤‚ अनागत बाधापà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥‡à¤§ की सà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾à¤“ं के अà¤à¤¾à¤µ में इनसे महामारी (epidemic) फैल सकती है, जो कà¤à¥€-कà¤à¥€ फैलकर सारà¥à¤µà¤¦à¥‡à¤¶à¤¿à¤• (pandemic) रूप à¤à¥€ धारण कर सकती है।
19वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में पाशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥à¤¯ वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• लूई पासà¥à¤šà¤° ने अपने पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤—ों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ यह पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£à¤¿à¤¤ किया कि जीवाणà¥à¤“ं (bacteria) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ विशिषà¥à¤Ÿ वà¥à¤¯à¤¾à¤§à¤¿à¤¯à¤¾à¤ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हो सकती हैं। कॉक नामक वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• ने बैकà¥à¤Ÿà¥€à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ की कतिपय पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤—शालीय पदà¥à¤µà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर à¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ाश डाला। ततà¥à¤ªà¤¶à¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ इस पà¥à¤°à¤•ाश से पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ लेकर अनेक वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• संहारक रोगों के जनक इन जीवाणà¥à¤“ं की खोज में लग गठऔर 19वीं शताबà¥à¤¦à¥€ के अंतिम चरण में वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ों ने रोगजनक जीवाणà¥à¤“ं की खोज यथा पूयोतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤•, राजयकà¥à¤·à¥à¤®à¤¾, रोहिणी (diphtheria), आंतà¥à¤° जà¥à¤µà¤° (Typhoid), विसूचिका (cholera), धनà¥à¤¸à¥à¤¤à¤‚ठ(tetanus), ताऊन (plague) à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤•ा (dysentery) आदि संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोगों के विशिषà¥à¤Ÿ जीवाणà¥à¤“ं का पता लगाकर इनके गà¥à¤£à¤§à¤°à¥à¤®, संकà¥à¤°à¤®à¤£ à¤à¤µà¤‚ नैदानिक पदà¥à¤§à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर à¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ाश डाला।
अब इस दिशा में अतà¥à¤¯à¤§à¤¿à¤• सफलता पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की गई है तथा इस पà¥à¤°à¤•ार के अधिकांश रोगों के जीवाणà¥à¤“ं का निशà¥à¤šà¤¿à¤¤ रूप से पता लगा लिया गया है। परिणामत: इनके संकà¥à¤°à¤®à¤£ की रोकथाम की तथा चिकितà¥à¤¸à¤¾ में à¤à¥€ परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ सफलता मिलने लगी है। ये रोगजनक जीवाणॠअतà¥à¤¯à¤‚त सूकà¥à¤·à¥à¤® होते हैं और केवल सूकà¥à¤·à¥à¤®à¤¦à¤°à¥à¤¶à¥€ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ ही देखे जा सकते हैं। इसलिठइनको जीवाणॠकहते हैं। सूकà¥à¤·à¥à¤®à¤¾à¤•ार के ही कारण इनकी लंबाई माइकà¥à¤°à¥‹à¤¨ में बतलाई जाती है। ये जीव वरà¥à¤— के à¤à¤• कोशिकावाले अतिसूकà¥à¤·à¥à¤® जीव होते हैं।
परिचय
रोगजनक, संकà¥à¤°à¤®à¤£ में किसी न किसी जीवाणॠका पà¥à¤°à¤¾à¤¯: हाथ होता है। ये जीवाणॠवायà¥, जल, à¤à¥‚मि तथा पà¥à¤°à¤¾à¤£à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के शरीर में कहीं कम, कहीं अधिक तथा समय विशेष à¤à¤µà¤‚ विशेष जलवायॠकà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में नà¥à¤¯à¥‚नाधिक संखà¥à¤¯à¤¾ में पाठजाते हैं। पà¥à¤°à¤¾à¤¯: à¤à¤• विशिषà¥à¤Ÿ पà¥à¤°à¤•ार की विकृति तथा लकà¥à¤·à¤£ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ करनेवाले संकà¥à¤°à¤®à¤£ में à¤à¤• विशिषà¥à¤Ÿ पà¥à¤°à¤•ार का जीवाणॠउतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥€ होता है, किंतॠकà¤à¥€-कà¤à¥€ à¤à¤• से अधिक पà¥à¤°à¤•ार के जीवाणà¥à¤“ं का संकà¥à¤°à¤®à¤£ à¤à¤• साथ à¤à¥€ होता है, जिसे मिशà¥à¤° संकà¥à¤°à¤®à¤£ कहते हैं और कà¤à¥€ à¤à¤• ही पà¥à¤°à¤•ार की विकृति अनेक à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¤•ार के जीवाणà¥à¤¸à¤‚कà¥à¤°à¤®à¤£ से à¤à¥€ होती है।
संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¥€ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ से अनà¥à¤¯ सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के शरीर में संकà¥à¤°à¤®à¤£ à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨-à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¤•ार से होता है। फिरंग (syphilis), सूजाक (gonorrhoea) तथा विसरà¥à¤ª (erysipelas) à¤à¤µà¤‚ मसूरिका आदि रोगों का संकà¥à¤°à¤®à¤£ मृत, संकà¥à¤°à¤¾à¤‚त या वाहक मनà¥à¤·à¥à¤¯ या पशॠके पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· संसरà¥à¤— से होता है। कà¥à¤› संकà¥à¤°à¤®à¤£, जैसे जलसतà¥à¤°à¤¾à¤¸ आदि, कà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‡, सà¥à¤¯à¤¾à¤° तथा चूहे के काटने से होते हैं। शà¥à¤µà¤¸à¤¨à¤¤à¤‚तà¥à¤° के कà¥à¤› रोगों का संकà¥à¤°à¤®à¤£ खाà¤à¤¸à¤¨à¥‡, छींकने या जोर से बोलते समय छोटे छोटे बिंदà¥à¤“ं के बाहर निकलने से समीप में बैठनेवालों को हो जाता है। इसे बिंदूक संकà¥à¤°à¤®à¤£ होना (Droplet infection) कहते हैं। संकà¥à¤°à¤¾à¤‚त, वà¥à¤¯à¤¾à¤§à¤¿à¤¤ या वाहक वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के दूषित वसà¥à¤¤à¥à¤°, पातà¥à¤°, खादà¥à¤¯, पेय, हाथ, यंतà¥à¤°, शसà¥à¤¤à¥à¤°, वायॠà¤à¤µà¤‚ मà¥à¤– संबंधी वसà¥à¤¤à¥à¤“ं के सेवन से अपà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· संकà¥à¤°à¤®à¤£ होता है। पाचन तंतà¥à¤° के संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोगों को फैलाने में घरेलू मकà¥à¤–ी à¤à¤• पà¥à¤°à¤®à¥à¤– यांतà¥à¤°à¤¿à¤• वाहक (machanical carrier) है। कà¥à¤› रोग जैसे मलेरिया, कालाजार, शà¥à¤²à¥€à¤ªà¤¦, पà¥à¤²à¥‡à¤— आदि का संकà¥à¤°à¤®à¤£ कीटाणà¥à¤“ं के वाहक मचà¥à¤›à¤°, पिसà¥à¤¸à¥‚, à¤à¥à¤¨à¤—े, जूठऔर किलनी के दंश से होता है।
संकà¥à¤°à¤®à¤£ के कà¥à¤› समय बाद रोगों के लकà¥à¤·à¤£ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होते हैं। इस काल को उदà¥à¤à¤µà¤¨ काल (Incubation period) कहते हैं। विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ रोग-जनक-जीवाणà¥à¤“ं के उदà¥à¤à¤µà¤¨ काल à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ होते हैं।
सपà¥à¤°à¤¤à¤¿ अधिकांश रोगजनक संकà¥à¤°à¤®à¤£à¥‹à¤‚ के विशिषà¥à¤Ÿ निदान à¤à¤µà¤‚ चिकितà¥à¤¸à¤¾ उपलबà¥à¤§ हैं और आगे इस दिशा में तीवà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥‚रà¥à¤µà¤• कारà¥à¤¯ हो रहा है।
जीवाणà¥-संकà¥à¤°à¤®à¤£ à¤à¤µà¤‚ विषाणà¥-संकà¥à¤°à¤®à¤£ में à¤à¥‡à¤¦
जीवाणॠसंकà¥à¤°à¤®à¤£ और विषाणà¥-संकà¥à¤°à¤®à¤£ दोनो के लकà¥à¤·à¤£ समान हो सकते हैं। किस कारण से संकà¥à¤°à¤®à¤£ हà¥à¤† है, यह बताना कठिन कारà¥à¤¯ है।[1] किनà¥à¤¤à¥ संकà¥à¤°à¤®à¤£ का कारण बैकà¥à¤Ÿà¥€à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ है या वाइरस, यह पता करना बहà¥à¤¤ महतà¥à¤µ का है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि विषाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£ को पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤œà¥ˆà¤µà¤¿à¤•ों के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ ठीक नहीं किया जा सकता।
विषाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ तथा जीवाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£ की तà¥à¤²à¤¨à¤¾ वैशिषà¥à¤Ÿà¥à¤¯ विषाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£ जीवाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£
सामानà¥à¤¯ लकà¥à¤·à¤£ सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ विषाणॠके कारण पैदा संकà¥à¤°à¤®à¤£ शरीर के कई अंगों को पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ करता है। बहà¥à¤¤ कम विषाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£à¥‹à¤‚ के होने पर दरà¥à¤¦ होता है (जैसे हरà¥à¤ªà¥€à¤œ)। विषाणॠदà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ संकà¥à¤°à¤®à¤£à¥‹à¤‚ में खà¥à¤œà¤²à¥€ या 'जलन' होती है। जीवाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ संकà¥à¤°à¤®à¤£ में किसी सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर लाली, गरà¥à¤®à¥€, सूजन और दरà¥à¤¦ होते हैं। इसका विशेष लकà¥à¤·à¤£ है कि शरीर के किसी à¤à¤• à¤à¤¾à¤— या सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर दरà¥à¤¦ होता है, विसà¥à¤¤à¥ƒà¤¤ à¤à¤¾à¤— पर नहीं।
कारण रोगजनक विषाणॠरोगजनक जीवाणà¥
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